कर्म पर संस्कृत श्लोक


हिन्दू धर्म में संस्कृत भाषा को महत्वपूर्ण माना गया है, आदिकाल से ही इस भाषा में श्लोक, ग्रन्थ, पुराण आदि निर्मित किये जाते रहे हैं। पहले श्लोक के माध्यम से जानकारी साझा की जाती थी तथा संस्कृत के श्लोक को लिखने का चलन था। आपको हिन्दू धर्म में हर तरह के विषय पर पढ़ने को मिल सकता हैं। जैसे कर्म पर, आयुर्वेद पर, खगोलशास्त्र पर, गणित तथा विज्ञान आदि पर। आज के इस लेख में हम आपके लिए लाये हैं कर्म पर संस्कृत श्लोक तथा उनके अर्थ जो आपको कर्म और उनके परिणामो को समझने में सहायता करेंगे।

कर्म पर संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अनुवाद : भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में ही तेरा अधिकार है। कर्म के फल का अधिकार तुम्हारे पास नहीं है। इसलिए तू केवल केवल कर्म पर ध्यान दे उसके फल की चिंता न कर।

सर्वे कर्मवशा वयम्।

अनुवाद – सब कर्म के ही अधीन हैं।

न श्वः श्वमुपासीत। को ही मनुष्यस्य श्वो वेद।

अनुवाद – कल के भरोसे मत बैठो। कर्म करो, मनुष्य का कल किसे ज्ञात है?

अचोद्यमानानि यथा, पुष्पाणि फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते, तथा कर्म पुरा कृतम्।

अनुवाद – जिस तरह फल, फुल बिना किसी प्रेरणा के समय पर उग जाते हैं, उसी प्रकार पहले किये हुए कर्म भी यथासमय ही अपने फल देते हैं। यानिकी कर्मों का फल अनिवार्य रूप से मिलता ही है।

दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत्।

अनुवाद – दिनभर ऐसा कार्य करो जिससे रात में चैन की नींद आ सके।

अकर्मा दस्युः।

अनुवाद – कर्महीन मनुष्य दुराचारी है।

ज्ञेय: स नित्यसंन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||

अनुवाद – जो पुरुष न तो कर्मफलों से घृणा करता है और न कर्मफल की इच्छा करता है, वह नित्य संन्यासी जाना जाता है। हे महाबाहु अर्जुन! मनुष्य समस्त द्वन्दों से रहित होकर भवबंधन को पार कर पूर्णतया मुक्त्त हो जाता है।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य: |
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||

अनुवाद – जो व्यक्ति कर्मफलों को परमेश्वर को समर्पित करके आसक्तिरहित होकर अपना कर्म करता है, वह पापकर्मों से उसी प्रकार अप्रभावित रहता है, जिस प्रकार कमलपत्र जल से अस्पृश्य रहता है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

अनुवाद – कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।

अनुवाद – तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

कर्मणामी भान्ति देवाः परत्र कर्मणैवेह प्लवते मातरिश्वा।
अहोरात्रे विदधत् कर्मणैव अतन्द्रितो नित्यमुदेति सूर्यः।।

अनुवाद – कर्म के कारण ही देवता चमक रहे हैं। कर्म के कारण ही वायु बह रही है। सूर्य भी आलस्य से रहित कर्म करके नित्य उदय होकर दिन और रात का विधान कर रहा है।।

बह्मविद्यां ब्रह्मचर्यं क्रियां च निषेवमाणा ऋषयोऽमुत्रभान्ति।।

अनुवाद – ऋषि भी वेदज्ञान, ब्रह्मचर्य और कर्म का पालन करके ही तेजस्वी बनते हैं।

प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि।
अकृत्वा च पुनर्मुःखं कर्म पश्येन्ममहाफलम।।

अनुवाद – प्राय देखने में आता है कि इस संसार में किए गए कर्म का फल मिलता है। काम न करने से दुख ही मिलता है। कर्म महान फलदायक होता है।।

कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत ।।

अनुवाद – भरतनंदन! मनुष्य अपने कर्मों से स्वर्ग, सुख और दुःख पाता है।।

कर्मणा वर्धते धर्मो यथा धर्मस्तथैव सः।।

अनुवाद – कर्म से ही धर्म बढ़ता है। जो जैसा धर्म अपनाता है, वह वैसा ही हो जाता है।।

यत् कृतं स्याच्छुभं कर्मं पापं वा यदि वाश्नुते।
तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्भिः।।

अनुवाद – मनुष्य जो भी अच्छे-बुरे कर्म करता है। उनका फल उसे भोगना पड़ता है इसीलिए मन, बुद्धि और शरीर से सदा अच्छे कर्म करने चाहिए।।

कृतमन्वेति कर्तारं पुराकर्म दिजोत्तम।।

अनुवाद – विप्रवर! पहले किए हुए कर्म का फल कर्म करने वाले को भोगना ही पड़ता है।

येन येन शरीरेण यद्यत् कर्म करोति यः।
तेन तेन शरीरेण तत्फलं समुपाश्नुते।।

अनुवाद – प्राणी जिस जिस शरीर में जो जो कर्म करता है वह उसी शरीर से उस कर्म का फल भी भोगता है।

शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम्।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम्।।

अनुवाद – मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्म के साक्षी पंचमहाभूत होते हैं इन कर्मों का फल मृत्यु के बाद मिलता है अच्छे और बुरे कर्मों में जैसे कर्म अधिक होते हैं उनका फल पहले मिलता है।

न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा ।
मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृत दुष्कृतैः।।

अनुवाद – पिता के कर्म से पुत्र का और पुत्र के कर्म से पिता का कोई संबंध नहीं है । जीव अपने – अपने पाप – पुण्य कर्मों के बंधन में बंधे हुए अलग अलग रास्तों से अपने कर्मों के अनुसार जाते हैं।

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम्।।

अनुवाद – जैसे फूल और फल किसी की प्रेरणा के बिना ही उचित समय आने पर वृक्षों पर लग जाते हैं। वैसे ही पूर्व जन्म के कर्म भी अपने फल भुगतने के समय का उल्लंघन नहीं करते हैं । उचित समय आने पर उसका फल मिलता है।

आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम्।
गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम्।।

अनुवाद – दुःख और सुख अपने ही किए कर्मों का फल है । जीव गर्भ में आते ही अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोगने लगता है।

यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम्।।

अनुवाद – शास्त्र का सिद्धांत है कि जैसा कर्म होता है वैसा ही फल मिलता है।

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम।
कुरुते यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते।।

अनुवाद – मनुष्य, आंख, मन, वाणी और हाथ-पैर आदि से जैसा काम करता है उसके अनुसार मनुष्य को फल मिलता है।

नायं परस्य सुकृतं दुष्कृतं चापिसेवते ।
करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते।।

अनुवाद – जीवात्मा किसी दूसरे के पाप और पुण्य कर्मों का फल नहीं भोगता अपितु वह जैसे कर्म करता है उसके अनुसार उसे भोग मिलता है।

शुभकृच्छभयोनीषु पापकृत् पापयोनीषु।।

अनुवाद – अच्छे कर्म करने वाला प्राणी अच्छी योनियों में और पाप कर्म करने वाला प्राणी पापयोनियों में जन्म लेता है।

वीतरागा विमुच्यते पुरुषाः कर्मबन्धनैः।
कर्मणा मनसा वाचायेन हिंसन्ति किंचन।।

अनुवाद – जो मनुष्य कर्म, मन और वचन से किसी की हिंसा नहीं करते और जिनका सभी तरह का लगाव समाप्त हो गया है ऐसे पुरुष कर्म बंधनों से छूट । जाते हैं।

तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मच्यते कर्मबनधनैः।

अनुवाद – जिनके लिए शत्रु और प्रिय मित्र दोनों ही समान हैं ऐसे जितेंद्रिय पुरुष कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।

यादृशं कुरूते कर्म तादृशं फलमश्नुते ।
स्वकृतस्य फलं भुङ्क्ते नान्यस्तद् भोक्तुमर्हति ।।

अनुवाद – प्राणी जैसा कर्म करता है उसे उस कर्म का वैसा ही फल मिलता है वह अपने कर्मों का फल अपने आप ही भोगता है उसके कर्मों का फल कोई दूसरा नहीं भोगता है।

सर्वदात्मा कर्मवशो नानाजातिष जायते।।

अनुवाद – जीवात्मा सदैव अपने कर्मों के अधीन रहकर अनेकविध योनियों में जन्म लेती है।

कर्म कर्त्ता नरोऽभोक्ता सनास्ति दिवि वा भवि।।

अनुवाद – स्वर्ग में या पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसे अपने किए हुए कर्मों का फल न भोगना पड़ता हो।

न शक्यं कर्मचाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः।

अनुवाद – देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मों का फल भोगे बिना नहीं रह सकता है।

यथा कर्म कृतं लोके तथैतानुपपद्यते।।

अनुवाद – संसार में मनुष्य जैसा काम करता है उसे उसका वैसा ही फल मिलता है।

यस्य यद् विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते।

अनुवाद – जिस व्यक्ति का जैसा काम होता है उसे उस काम का फल अवश्य झुकना पड़ता है।

न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रियैरिह।
ते ह्यस्य साक्षिणो नित्यं षष्ठ आत्मा तथैव च।।

अनुवाद – मनुष्य की पांचों इंद्रियों द्वारा किया गया कर्म नष्ट नहीं होता है। पांचों इंद्रियों और छटा मन ये सब उस कर्म के साक्षी होते हैं।

नास्तिकः पिशुनश्चैव कृतघ्नो दीर्घदोषकः ।
चत्वारः कर्मचाण्डाला जन्मतश्चापि पञ्चमः ॥

नास्तिक, निर्दय, कृतघ्नी, दीर्घद्वेषी, और अधर्मजन्य संतति – ये पाँचों कर्मचांडाल हैं।

वागुच्चारोत्सवं मात्रं तत्क्रियां कर्तुमक्षमाः ।
कलौ वेदान्तिनो फाल्गुने बालका इव ॥

अनुवाद – लोग वाणी बोलने का आनंद उठाते हैं, पर उस मुताबिक क्रिया करने में समर्थ नहीं होते । कलियुग के वेदांती, फाल्गुन मास के बच्चों जैसे लगते हैं।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

अनुवाद – जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखते हैं, और कर्म में अकर्म को देखता हैं, वह इन्सान सभी मनुष्यों में बुद्धिमान है; एवं वह योगी सम्यक् कर्म करनेवाला

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